महाभारत का एक प्रसंग है जहाँ पांडव कौरवों से संधि के लिए जाते हैं. वह कौरवों से मात्र पांच गांव की मांग करते हैं. वो कहते हैं कि चाहें दुर्योधन पूरा हस्तिनापुर रख ले, लेकिन पांच गांव पांडवों को दे दे. अहंकार के मद में चूर दुर्योधन ने इसके बाद क्या किया, आप सबको पता है. महाभारत का युद्ध हुआ और भीषण युद्ध हुआ. उसका बखान आप शब्दों में नहीं कर सकते हैं. अहंकार और ईर्ष्या के कारण हुए इस धर्म युद्ध में युद्ध भूमि की लालिमा उस समय हुए रक्तपात को आज भी बताती है.
यदि किसी को यह लगता है कि दुर्योधन का अंत गदा के उस प्रहार से हुआ था, तो वह एक उसकी भूल है. दुर्योधन मात्र एक व्यक्ति विशेष नहीं अपितु एक हठी, कपटी और विश्वासघाती चरित्र का दर्पण है. आज के युग में भी ऐसे कई दुर्योधन समाज के भीतर हैं.
पिछले दिनों भारत के जिस जांबाज़ को पाकिस्तान ने मजबूरन वापस किया था, उस मजबूरी को देश के कुछ उदारवादी चरित्र वाले लोगों ने इमरान खान की दरियादिली बताई है. उन लोगों के शब्दों से यह प्रतीत हो रहा था जैसे भारत ही युद्ध प्रेमी है. यह तब था जब सरहद पर ‘श्वेत कबूतरों’ के कतरे हुए पंख आज भी पड़े हुए मिल जाएंगे. #SayNoToWar और #WeWantPeace जैसे हैशटैग बताने का प्रयास कर रहे थे जैसे दुनिया में युद्ध के जनक हम ही हो. जैसे हमने ही परमाणु बमो का निर्माण कर इस धरा को अग्नि बाणों की शय्या पर धकेल दिया हो. जैसे हमने ही दुनिया में जिहाद के नाम पर लोगों के गले काटे हो.
आधुनिक काल का महाभारत भी उतने ही बड़े पैमाने पर लड़ा जा रहा है, जितने बड़े स्तर पर द्वापर में लड़ा गया था. विचारों के दो फाड़ तब भी थे, आज भी हैं. विचारों की भिन्नता एक अच्छे लोकतंत्र का परिचायक है, लेकिन जब कुछ विचार अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र की गरिमा पर कुठाराघात करने लगे तो धृतराष्ट्र जैसे बड़े लोगों की चुप्पी दुर्योधन जैसे विचारों को और पल्लवित करती हैं. यह बहुत खतरनाक है. इमरान खान के लिए भारतीय ‘लिबरल प्रेम’ भारत के शहीदों का अपमान है. उनके सीने में लगने वाली पाकिस्तानी गोली ने कभी उनके लिए ‘उदारवादी अप्रोच’ नहीं अपनाई.
जिनेवा कन्वेंशन की जिस ‘मजबूरी’ को इमरान खान के ‘नोबल पीस प्राइस’ का वाहक बताए जाने की कोशिश हो रही है, दरअसल वह एक कुपोषित विचारधारा की आखिरी चींख है. आज वैश्विक स्तर पर जिस राजनीति का प्रतिनिधित्व एक व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है, उसकी शुरुआत उसी 2014 से हुई थी जब दशकों पुरानी व्यवस्था पर उस व्यवस्था के बाहर का व्यक्ति विराजमान हुआ. स्थितियां ऐसी बन गयी कि पाकिस्तानी दहलीज पर जा कर भारत के कुछ राजनेताओं को अपने स्वाभिमान की पगड़ी रख यह कहना पड़ा कि इन्हें हटाइये, हमें लाइये. बाकी कसर ‘सबूत दिखाओ’ वाले हठ ने पूरी कर दी. देश के लिए वही वाक्य आज भी ‘सनद रहे’ वाले संदेश को दे रहे है.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के इस तथाकथित शांति प्रस्ताव या पहल पर जो तालियाँ बजायी जा रही हैं, उसके बीच राजनैतिक बिरादरी से ही कुछ आवाज़ें सवालों की शक्ल में देश के नेतृत्व के सामने जा रहे हैं. ऐसे नाज़ुक समय में भी लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर पर एक दाग लगाने का प्रयास किया जा रहा है. दिल्ली विधानसभा में जो हुआ, वह सबने देखा. आंदोलनों की बैसाखियों पर खड़ा हुआ राजकुमार किस प्रकार से दिल्ली विधानसभा में पाकिस्तानी बिरयानी के लिए मसाला तैयार कर रहा था, वह सबने देखा. लूट्यन्स दिल्ली वाले समाज ने तो कभी भी कड़वी चाय बनाने वाले को अपनाया ही नहीं. उसी लूट्यन्स बिरादरी को आज इमरान की तारीफों के कसीदे गढ़ते हुए देख हंसी छूट जाती है. रावण के भी मात्र दस सिर ही थे, यहाँ तो गिनती ही नहीं है.
धर्म युद्ध अपने आखिरी चरण में है. सारे पत्ते खुल चुके हैं. योद्धा मैदान में हैं और तरकश का हर तीर पैना कर लिया गया है. कौरवों और पांडवों की लड़ाई में इस बार बहुत कुछ बदल चुका है. नहीं बदली है तो बस एक चीज़… सत्य!
आज भी जीत उसी की होगी जिसके साथ सत्य होगा, लेकिन हस्तिनापुर की प्रजा यह न भूले कि इस धर्मयुद्ध में शिखण्डियों ने कौरवों का साथ पकड़ा हुआ है. 70 वर्ष पुराने हथियार से एकबार फिर युद्ध जीतने का प्रयास किया जाएगा. व्यवस्था तो पहले से ही अपनी कभी नहीं थी. इन सबके बीच हस्तिनापुर की कमान मज़बूत हाथों में हो, इसका फैसला जनता कुछ महीनों बाद कर ही देगी. कलियुग का दुर्योधन फिर हारेगा.
