मैडिसन स्क्वायर गार्डन में प्रधानमंत्री मोदी की स्पीच होने वाली थी. स्पीच हुई और वो इतिहास के पन्नों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का विदेशी धरती पर दिए हुए क्रांतिकारी भाषणों की लिस्ट में लिख दी गयी. उसी मैडिसन स्क्वायर गार्डन के बाहर बहुत से भारतीय पत्रकारों और टीवी मीडिया चैनलों की ओबी वैन भी खड़ी थी, जो लगातार इस घटना के सजीव चित्र आपके टीवी चैनलों पर प्रसारित कर रही थी. उन्हीं मीडिया चैनलों के पत्रकारों में से एक पत्रकार (वही वाले) की वहां के कुछ भारतीयों से झड़प हो गयी.
पत्रकार महोदय के चेहरे की लालिमा ने पूरी खबर सनसनीखेज़ तरीके से सबके सामने रख दी. मात्र विचारों की भिन्नता पर असहिष्णु हो जाने वाले ऐसे लोग आज प्रधानमंत्री मोदी की ‘घर में घुसकर मारेंगे’ वाली बात पर आगबबूला हो उठे हैं. ‘न्यूक्लियर स्टेट’ की दुहाई दी जा रही है. जवानों की सुरक्षा से खिलवाड़ जैसे न जाने कितने तर्क रखे जा रहे हैं. कुछ पत्रकारों के लिए प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान दो ‘एटमी ताकतों’ के बीच तनाव पैदा कर वोट बटोरने वाला बयान है. उनके इस लॉजिक को ज़रा इतिहास के नज़रिए से देखते हैं.
1971 का युद्ध जीतने के एक साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ 3 और राज्यों में भी चुनाव समय से पहले करा लिए थे. बांग्लादेश के गठन का लाभ इंदिरा गांधी को मिला और इन राज्यों में कांग्रेस को जीत हासिल हुई थी. याद रहे कि 1972 में तमिलनाडु छोड़कर देश के तकरीबन हर राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. अब क्या इसको इंदिरा गांधी का ‘वोटों का लालच’ कहें? दूसरी तरफ तो चुनावो के ऊपर नरेंद्र मोदी या किसी केंद्रीय मंत्री द्वारा कोई हस्तक्षेप किया ही नहीं जा रहा, और उस समय तो चुनावों को ही ‘समय से पहले’ करवा दिया गया था.
इन कुतर्कों के बीच कोई भी राय बनाने से पहले पूर्व में भारत द्वारा झेले गए आतंकी दंश को ज़रा याद कीजिये. हो सकता है इनमें से कुछ दंश आपने भी झेले होंगे. हर साल भारत के अंदर कोई न कोई आतंकी हमला होता ही रहता था. स्थितियां ऐसी बन गयी थी कि कुछ लोगों ने तो इन आतंकी हमलों को इतनी सहजता से स्वीकार कर लिया था, जैसे यह उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा हो. यह उन सरकारों के लिए सबसे लज्जित कर देने वाली बात थी. उस समय किसी का ध्यान हमारी सशस्त्र सेनाओं के बाहुबल पर नहीं गया था. 26/11 जैसे हमले के बाद भी हमारी चुप्पी विश्व पटल पर हमारी ताकत और सामर्थ्य को चुनौती दे रही थी.
2014 के नतीजों के बाद से सीमा पार की भी हलचल ने स्पष्ट किया कि जिस ‘धार्मिक राष्ट्र’ की नींव पर पाकिस्तान खड़ा हुआ था, उसको अब एक ‘राष्ट्रवादी’ विचारधारा से आने वाला व्यक्ति चुनौती देने वाला है. उनको यह पता था कि पिछले कुछ दशको से भारतीय नेतृत्व के द्वारा जिस ‘अन-डिसाइसिवनेस’ के वो आदि हो चुके थे, वह अब खत्म होने वाली है. पहली सर्जिकल स्ट्राइक उसका सबूत था. उनको समझ में आ गया था कि 2014 का बदलाव भारतीय उप-महाद्वीप में जिहादी तंजीमों के लिए एक उल्टी गिनती की शुरुआत थी.
वैसे तो जिन्ना का ‘जिन्न’ अभी भी हर पाकिस्तानी के अंदर है, लेकिन भारत के भीतर जिस ‘अहिंसा’ के मंत्र के नीचे भारतीय सेना के बाहुबल को बांध कर रखा गया, वो एक अक्षम्य पाप है. शक्तिशाली यदि समय पड़ने पर शक्ति प्रदर्शन न करे तो यह उसकी शक्ति का भी अपमान है, और एक अपराध भी है. हम अपने देश के अंदर किसी को आतंक सिर्फ इसलिए नहीं फैलाने दे सकते हैं क्योंकि फलां देश एक ‘एटमी ताकत’ है. अत्याचार के विरुद्ध आपकी चुप्पी उस अत्याचार के प्रति आपकी मौन स्वीकृति होती है. आज उसी चुप्पी को भारत की सेना और भारत का राजनैतिक नेतृत्व तोड़ रहा है, तो इसकी गूंज रावलपिंडी तक सुनाई दे रही है. पहली बार शायद ऐसा हो रहा है कि भारत की जगह हाई-अलर्ट पर पाकिस्तान बैठा है. कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में ‘ब्लैक-आउट’ किया जा रहा है, इस डर से कि कहीं भारतीय सेना कोई बम न गिरा दे. यह डर आवश्यक है. यही होना भी चाहिए.
पाकिस्तान जिस बारूद पर बैठा है, उसका अंत मात्र तबाही है. वो उसके पड़ोसियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया के लिए खतरनाक है. आतंकवाद का नाग सात समंदर पार अमेरिका तक यदि पहुँचा, तो उस ज़हरीले नाग का बिल पाकिस्तान में ही पाया गया था. कैंसर ज़्यादा न फैले, इसके लिए उसको जड़ से खत्म किया जाता है. क्या कोई यह जवाब देगा कि जिस धरती से आतंकवादी हमारे देश में घुसकर आतंकी हमले करते हैं, उसके ऊपर कार्यवाही क्यों नहीं की जाए. वहीं जब इन आतंकवादियों का जनक भारतीय सैनिकों के मृत शरीर पर अपने प्रधानमंत्री के लिए ‘शांति का नोबल पुरस्कार’ मांगता है, तो ‘अहिंसा’ की मर्यादा में रहना बहुत मुश्किल हो जाता है. यह गुस्सा और भी बढ़ जाता है जब यही लिबरल बिरादरी के पत्रकार उसी प्रधानमंत्री को ‘स्टेट्स मैन’ बोलते नहीं थकते हैं. हिपोक्रिसी की भी सीमा होती है.
भारतीय सेना ने कभी अपने पुरुषार्थ का हिसाब देने से इनकार नहीं किया है. अगर घर में घुस कर मारा है, तो मारा है. आतंकवाद के खिलाफ प्रहार किया है, तो उसको स्वीकार भी किया है. यही हमारे नेतृत्व पर भी लागू होती है. आज तक ऐसा नहीं किया गया, तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता है कि आगे भी नहीं किया जाना चाहिए. वैसे भी, ‘अहिंसा’ का सारा ठेका भारत ने तो नहीं ले रखा है. आज हमने सख्ती दिखाई तो देखिये कैसे सीमा पार से शांति की अपील होने लगी. तथाकथित ‘पीस जेस्चर्स’ दिखाए जाने लगे.
आज अमरीका और इजराइल से भारत की तुलना करने वालों को सबसे पहले अपनी सोच भी अमरीकियों और इसराएलियों जैसी करनी पड़ेगी, तब बात बनेगी. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमरीकियों ने यह नहीं देखा कि पाकिस्तान एक एटमी ताकत है या नहीं. उसने कार्यवाही की थी. इजराइल ने भी अपने मारे गए खिलाड़ियों का बदला चुन कर लिया था. जब उस पर ताली बजा सकते हैं तो हमारे प्रधानमंत्री में क्या बुराई है? वो तो डोनाल्ड ट्रम्प की तरह परमाणु युद्ध की बातें भी नहीं करते हैं.
घुस कर मारा था, आगे भी मारेंगे…क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब भी हम शांत हुए हैं, हमें ज़्यादा दिनों तक शांत नहीं रहने दिया गया है. यदि किसी को पीड़ा हो रही है, तो यह उनकी अपनी दिक्कत है. यह ‘वॉर मोंगरिंग’ नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करना है. सीमा पार भी तो पता चलना चाहिए कि हम ज़िंदा कौम हैं, हम हिसाब लेना जानते हैं.
