कोरेगाँव का जश्न क्यों?

जून, 1817 की संधि के मुताबिक ही मराठा संघ के ऊपर से पेशवा का नियन्त्रण समाप्त हो गया था. 5 नवम्बर, 1817 के युद्ध मे पेशवा अपनी राजधानी पुणे भी गँवा चुके थे. इसके बाद सिंधिया, होल्कर और नागपुर के भोंसले के सहायता की प्रतीक्षा करते हुए पेशवा महाराष्ट्र के एक किले से दूसरे किले तक कम्पनी की सेना से बचते बचाते समय गुजार रहे थे. लेकिन इन राजाओं से न कोई सहायता आनी थी और न ही आई.

नवम्बर के असफल प्रयास के बाद दिसम्बर में पेशवा ने फिर से पुणे पर चढ़ाई करने की योजना बनाई. पुणे के अंग्रेज प्रशासक ने शिरूर से एक छोटी सैन्य टुकड़ी को पेशवा की सेना को रोकने के लिए भेजा. 1 जनवरी, 1818 को भीमा नदी के किनारे कोरेगांव में दोनों सेनाओं की भिड़ंत हुई. इसमें कम्पनी की सेना बहुत बहादुरी से लड़ी थी और उसने अपने से कई गुना बड़ी सेना के सामने आत्मसमर्पण नही किया था. किन्तु यह कोई निर्णायक युद्ध नही था. 6 माह बाद हुए पेशवा के आत्मसमर्पण का भी इस युद्ध से कोई विशेष सम्बन्ध नही है. ऐतिहासिक दृष्टि से खड़की का युद्ध जो 5 नवम्बर, 1817 में हुआ था और सांगली का युद्ध जो फरवरी, 1818 में हुआ था, अधिक महत्वपूर्ण थे. अपनी सेना की वीरता को सम्मान देने के लिए कम्पनी ने कोरेगांव में एक विजय स्तंभ बनवाया. इस विजय स्तंभ पर मरने वाले 49 सैनिकों के नाम खुदे हैं जिनमें से 22 महार जाति के बताये जाते हैं. डॉ अंबेडकर के पिता रामजी सकपाल भी महार रेजिमेंट में ही कार्यरत थे. सम्भव है कि इसी कारण से 1 जनवरी, 1927 को अंबेडकर कोरेगाँव पहुँचे और कम्पनी की तरफ से मारे गए सैनिकों को याद किया. तब से यह परम्परा बन गई कि प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को दलित समुदाय के कुछ लोग कोरेगाँव पहुँचते हैं और कम्पनी की सेना के मारे गए जवानों को याद करते हैं.

प्रश्न उठता है कि जहाँ पूरे देश मे विदेशी सत्ता से भारतीय राजाओं, नवाबों के पराजय को एक दुखद घटना के रूप में याद किया जाता है, वहीं कोरेगाँव में इसे एक गर्व के रूप में कुछ लोग क्यों याद करते हैं? कुछ विचारक, जो स्वयं को ‘बहुजन विचारक’ कहते हैं, आरोप लगाते हैं कि पेशवा राज वास्तव में शिवाजी महाराज का स्वराज नही था. पेशवा राज बहुजन विरोधी, रूढ़िवादी और स्त्री विरोधी था. यही नही, छत्रपति का राज्य भी उन्होंने धोखे से हड़प लिया था. इसलिए ये ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक अत्याचारी शासन के पतन पर खुशी मनाते हैं. यहाँ हम इन आरोपों की सत्यता जाँचने का प्रयास करेंगे.

मालवा राज्य (इंदौर) के संस्थापक मल्हार राव होल्कर एक चरवाहा थे. वह गरेड़िया (धांगड़) जाति के थे. मराठा सेना में वे जानवरों की देखभाल ही करते थे. लेकिन भट्ट वंश के प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें सेना में मुख्य भूमिका दी गई. मुगलों से मालवा को मुक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण पेशवा ने पश्चिमी मालवा का बड़ा भाग होल्कर को सूबेदारी के रूप में दे दी. एक चरवाहा अपनी प्रतिभा के बल पर सूबेदार और सेनापति बन गया. क्या होल्कर की तरक्की इस बात का प्रमाण नही कि पेशवाओं ने प्रतिभा को जाति से जोड़कर नही देखा? राणो जी सिंधिया जो इतिहासकार उदय कुलकर्णी के अनुसार पेशवा के दरबार मे परिचारक थे और उनका काम पेशवा को जूते पहनाना था, आगे चलकर सूबेदार और सेनापति बने. आज भी उनके वंशज भारत की राजनीति में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं. क्या परिचारकों और गरेड़ियों को सत्ता में हिस्सेदारी और सेना का नेतृत्व देने वाले पेशवा को बहुजन विरोधी कहा जा सकता था? 1761 में पानीपत के युद्ध के बाद ग्वालियर के स्वर्गीय सूबेदार राणोजी शिंदे का एक ही पुत्र जीवित बचा. वह थे महादजी शिंदे. किन्तु महादजी राणोजी की विवाहिता पत्नी के पुत्र नही थे. वह एक दासी पुत्र थे. ऐसे में पुणे के पेशवा दरबार मे यह प्रश्न उठाया गया कि महादजी को उत्तराधिकार कैसे दिया जा सकता है. लेकिन पेशवा माधव राव ने महादजी शिंदे के दावे को मान्यता दी और उन्हें ग्वालियर और उज्जैन का उत्तराधिकार सौंप दिया गया. ऐसी ही परिस्थिति इंदौर रियासत में भी खड़ी हुई जब महाराज मल्हारराव होल्कर और एक वर्ष बाद उनका पौत्र की भी मृत्यु हो गई. पुत्र खांडे राव पहले ही वीरगति पा चुके थे. तब पेशवा माधवराव ने होल्कर महाराज की पुत्रवधु अहिल्याबाई को उत्तराधिकार सौंप दिया. पेशवा बाजीराव के भतीजे सदाशिव राव का विवाह एक कायस्थ परिवार में हुआ था. पेशवा बालाजी बाजीराव के पुत्र और उत्तराधिकारी विश्वासराव का विवाह भी कायस्थ परिवार में ही हुआ था. आज से 250 वर्षों से भी पहले एक ब्राह्मण शासक का जाति के बाहर विवाह करना कितना कठिन और क्रान्तिकारी निर्णय रहा होगा, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है.

एक अवैध संतान को उत्तराधिकार देना, एक विधवा महिला को उत्तराधिकारी स्वीकार करना, मराठा साम्राज्य के भावी प्रशासक का विवाह जाति के बाहर करना आज से 250 वर्ष पूर्व क्रांतिकारी कदम थे. ऐसे कुछ उदाहरणों से ही प्रमाणित होता है कि रूढ़िवादिता और स्त्रीविरोधी होने के आरोप में तथ्य का अभाव है.

छत्रपति शाहूजी महाराज का पेशवा परिवार से सम्बन्ध कोई राजा और मंत्री का सम्बंध नही था. यह अपने आप मे एक अनूठा सम्बन्ध था. जब मुगलों के कैद से मुक्त होकर शाहूजी महाराज महाराष्ट्र आये तो उनकी ताई ने ही उन्हें स्वीकारने से मना कर दिया. ऐसे में बालाजी विश्वनाथ, जो तब मराठा राज्य के एक सामान्य अधिकारी थे, ने शाहूजी के लिए समर्थन जुटाया. जब शाहूजी के पेशवा भैरोजी को ताराबाई के सेनापति कान्होजी ने गिरफ्तार कर लिया तब विपरीत परिस्थितियों में बालाजी विश्वनाथ को पेशवा बनाया गया. छत्रपति की माता और पत्नी 30 वर्षों से मुगल कैद में थीं जिन्हें बालाजी विश्वनाथ ने ही मुक्त कराया था. महाराष्ट्र के मात्र 2 जिलों की छोटी सी मराठा रियासत का पूर्व में कटक और पश्चिम में अटक तक का विस्तार पेशवाओं के निर्देशन में ही हुआ. इन कारणों से शाहूजी पेशवा परिवार से अत्यधिक स्नेह रखते थे. पेशवा परिवार के विवाह सम्बंध अथवा उत्तराधिकारी की शिक्षा दीक्षा का दायित्व भी वे स्वयं ही निभाते थे. यहाँ तक कि जब छत्रपति अपने घरेलू मसले निबटाने का दायित्व भी पेशवा बालाजी बाजीराव को ही देते थे.

शाहूजी के कोई पुत्र न था. ऐसे में उनकी ताई ताराबाई ने दावा किया कि उनका एक पौत्र दूर किसी गाँव मे पल रहा है जिसका नाम राजाराम है. शाहूजी ने राजाराम को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. लेकिन उसे वे अपने जीवनकाल में सतारा न ला सके. ऐसे में शाहूजी ने अपने पेशवा को ही राज्य का भला-बुरा देखने का दायित्व सौंपा. शाहूजी की मृत्यु के बाद राजराम छत्रपति बने. लेकिन शीघ्र ही ताराबाई और राजराम में मतभेद हो गए. ताराबाई ने छत्रपति राजाराम को ही गिरफ्तार कर लिया. बहुत ही विकट परिस्थिति हो गई जब ताराबाई ने इष्टदेव की शपथ लेकर यह घोषणा कर दी कि राजराम उनका पौत्र नही बल्कि एक बहरूपिया है और ऐसे में वह राज्य का अधिकारी ही नही है. उधर उत्तर में अब्दाली की आहट सुनाई दे रही थी और यहाँ मराठा साम्राज्य का राजा ही अवैध हो गया था. ऐसी कठिन परिस्थिति में पेशवा बालाजी बाजीराव ने समस्त अधिकार अपने हाथों में ले लिए किन्तु राजाराम को कैद से निकालकर छत्रपति के आसन पर बनाये रखा.

ऐसे में कहा जा सकता है कि पेशवाओं ने छत्रपति को धोखा देकर नही बल्कि एक मुश्किल परिस्थिति में मराठा साम्राज्य का नियंत्रण अपने हाथों में लिया जिसके विस्तार के लिए पेशवाओं ने सबसे अधिक पसीना और खून बहाया था. अब प्रश्न उठता है कि आखिर बहुजन और कम्युनिस्ट विचारक इस तरह का झूठ क्यों फैलाते हैं? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हिंदुत्व का संघर्ष तिलक, सावरकर और डॉ हेडगेवार के नेतृत्व में महाराष्ट्र से ही आरंभ हुआ. ऐसे में मराठा साम्राज्य की प्रतिष्ठा का हनन कर के उन्हें एक विशेष प्रकार का आनंद मिलता है.  बंगाल का नवाब शिराज-उ-द्दौला एक अय्याश आदमी था जिसकी नजर हमेशा ही सेठ अमीरचंद की विधवा बेटी पर रहती थी. इसी कारण अमीचन्द ने पलासी की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया. लेकिन फिर भी देश मे कोई पलासी के युद्ध मे शिराज-उ-द्दौला की हार का उत्सव नही मनाता. पलासी ही क्यों, बक्सर का युद्ध हो, पटना का युद्ध हो या पँजाब का युद्ध, देसी राजाओं पर अंग्रेजों की जीत का जश्न कहीं कोई नही मनाता.

फिर कोरेगाँव क्यों अपवाद हो?

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